Tuesday, 3 April 2018

"ट्यूलिप का फूल"

बसंत में जब उपवनों में
रंग बिरंगे खिल जाते
वैसे तुम मेरे दिल में
इसी मौसम में हम मिले थे!
ट्यूलिप का फूल जैसे
मेरा वो फूल हो चटकीला भड़किला सा
मानो तुम्हारे लिबाज़ हो
लाल,बैगनी,सुनहरा सा
सबके मन मोह जाता
जैसे तुम मेरा!
ट्यलूप के फूलों को पलट दूँ
तो तेरे माथे की पगड़ी बन जाए
यह मेरे प्रियतम का मान है
प्राणों से प्रिय है ये
मैं पानी के साथ साथ अपने
पसीने से सींचती हूँ
कहीं सुख ना जाए ये
आँसूओं से डूबोती हूँ
कहीं मर ना जाए
मन में आश जलाये रखती हूँ
धूप दीप दिखा तेरी सलामती की
दुआ मांगती हूँ!
इनके फूलों में तुम्हारी
प्रतिछाया जो पाती हूँ
तन मन प्रफूलित रहता मेरा
जैसे तुम्हारे पास होने पर होता था!
कुमारी अर्चना
पुर्णियाँ,बिहार
मौलिक रचना
३/४/१८

"लाल जोड़ा"

 जब भी लाल जोड़ा को देखती हूँ                                   खुद को दुल्हन बनी आईने में पाती हूँ                                  तू सेहरा बाँधे सामने नज़र आता है                                        सज संवर लेती हूँ खुद के ही हाथों से                                       अपने बाहरी रूप रंग को!                                                     गालों पे पाउण्डर                                                       आँखों में काजल                                                      माथे पर बिंदी                                                         हाथों में पोला और शंखा                                                  पाँव में पाजेब और बिछुवा                                            फिर जैसे ही सिंदुर लगाने जाती हूँ                                      मैं फिर से मैले कुचेले कपड़े में आ जाती हूँ                           कोई मुझे तेरी सुहागन ना समझ                                       ले मैं तो.......तेरी!                                                 कुमारी अर्चना                                                      जिला-पूर्णियाँ,बिहार                                              मौलक रचना©                                                       ३/४/१८

"मैं दर्द में हूँ"

मैं दर्द में हूँ
इसलिए किसी और के दर्द का
एहसास भी जाता रहा है!
किसी को दर्द क्या बयाँ करूँ
दर्द शरीर के रक्त में घुल कर
जिंदगी बन चुका है!
इसलिए दूसरों का दर्द भी
अब मेरा दर्द बन चुका है!
कली हो या पुष्प टहनी हो
या पेड़ पशु हो या पक्षी
आदमी हो या औरत
कीड़े हो या मकौड़े
जीव हो या निर्जीव
किसी को दर्द में देख के
अश्रु की अविरल धारा
बाहर आ जाती
मुझे सागर में डूबों जाती!
जाने कब तक डूबोती रहेगी
मैं ऊपर नीचे डूबकियाँ लगाती रहूँगी
खुदको और दूसरों को दर्द से
कभी निज़ात दिया पाऊँगी
या मैं भी दर्द बन जाऊँगी
अंतहीन सी!
कुमारी अर्चना
पूर्णिया,बिहार
मौलिक रचना
३/४/१८

"ऐ चिरैइया दाना चुगले"

ऐ चिरैइया  दाना चुगले                                                        दाना छत पर डाल रही                                              थोड़ा अपनी पेट में डाल लें                                         और थोड़ा अपनी चोंच  में!                                        क्योंकि सुबह से ही होंगे                                               भूखे प्यासे तेरे नन्हें से बच्चे                                       घोंसले  में जोह रहे होंगे                                                          अभी तक  वे बाट तेरी ही                                            दो  धूँट पानी  भी  पी  लें                                                           जो  रखा है कास्य के बर्तन में !                                                                                फिर उड़ना तू अनंत आकाश                                      छोड़कर धूल भरी तपती धरती                                      और बच जाना गर्म लू से                                                कल फिर आना चुंगने दाना                                                               फुदकते हुए मेरे ही छत पर..!                                     कुमारी अर्चना                                               पूर्णियाँ,बिहार                                                        मौलिक  रचना                                                        ३/४/१८

Monday, 2 April 2018

"एक चिठ्ठी तुम्हारे नाम"

मेरे प्रियत्म प्यारे!
प्रित भाव से प्रेमपत्र लिखा रही
आँसूओं को सियाही बनाके
अंदर का दर्द बाहर
शब्दों में उडेल रही!
केवल स्याही का
काला या नीला रंग नहीं
मेरे दर्द लहू बन उभरेगा
जब तुम मुझे दिल से
अपने आसपास हूँ मेहसूस करोंगे
मेरे दर्द को अपना दर्द सा समझोंगे
वरन् ये अनर्गल शब्द नज़र आएगे
और मैं बीती रात की बीती कहानी!
डाकिया से चिठ्ठी मिलते ही
अपना जबाब मुँह जवानी लिखना
कैसे हो तुम मुझसे जुदा होकर
हाल ए दिल बयाँ करना
खुशी में होगें तो मैं ना जलूँगी
गम़ में होगें तो ये ना कहना कि
मैं आसूँओं को न बहाऊँ!
अपने आसपास की बदलती हवा
बदलता मौसम
बदलते हालात
बदलते लोग का हाल
ए जज्बात ब्याँ करना!
क्या तुम भी मेरी तरह
तनहाई को पाते हो
अपने अंदर और बाहर अकेला
कमरा चुपचाप
खिड़की दिवारों की उदासी
गमसुम सन्नाटे की आती
आहटों को पाते हो
राते छोटी और
दिन बड़ा सा लगता है
मिलन की चाह में मन के साथ
आत्मा भी भटकती है और
शरीर बेज़ान सा रहता
बिस्तर पर सिलवटें और तकीये पर
अश्रु की बूँदे बिखरी रहती है
जब तुम सुबह उठते हो
मेरे ख्वाब से जाग कर!
कुमारी अर्चना
पूर्णियाँ,बिहार
मौलिक रचना
२/४/१८

"इच्छाशेष है"

बह चले मेरे भाव
भावनाओं के प्रवाह में
अब ना रूकेगें
जाये तू जिस ओर
जाउँगी मैं उसी छोर!
तेरे पदचिह्नों को ढूंढ़ती
अपना रस्ता बनाऊँगी
सब पिछल्लग्गू कहेंगे तो
कहने दो ना हँसते तो हँसने दो!
तू चलेगा तो मैं भी चलूँगी
तू दौड़गा तो मैं भी भागूँगी
तू रूकोंगे जहाँ मेरे मंजिल वहाँ
पर परछाई को कब
कोई पकड़ पाया है!

मेरे अंर्तमन में दबी
तुझे पाने की इच्छा शेष है
जिसे पाने के लिए
मैं और मेरा मन व्याकूल है!
क्यों दिल से तुझे चाहने की
आज भी इच्छाशेष है
भले तू तन से किसी और
का बन चुका है फिर भी
तुझे अपना बनना की इच्छाशेष है!
कुमारी अर्चना
पूर्णियाँ,बिहार
मौलिक रचना
२/४/१८

"पंचाली का ये कैसा कौमर्य"

क्यों पाँच पतियों की होकर भी
द्रौपदी नारी नहीं कन्या ही थी
हिंदू धर्मेग्रंथों पर बड़ा सवाल उठाती
जब एक स्त्री एक पुरूष से
संबंध बना कौमर्य खो देती है
फिर कैसे द्रौपदी कौमर्य भंग ना हुआ!
श्लोक में इनपात्रों अहिल्या,द्रोपदी,
कुन्ती,तारा,मन्दोदरी तथा
पंचकन्या स्वरानित्यम महापातक
नाशक कहा गया प्रात:काल
इनका नाम स्मरण करना चाहिए!
अर्जन ने मछली की आँख में
निशान साधकर स्वयंवर तो जीत लिया
पर द्रोपदी का दिल ना जीत सके
कुंती ने बिन देखे पाँच पाण्डवों में
द्रौपदी को वस्तु समझ बाँट दी
पर पाँचों के ह्रदय में द्रोपदी ना समां सकी
विवाह उपरांत पंचाली कहलायी
पर कभी सम्मान ना पा सकी
आज भी खिल्ली उड़ाई जाती है
स्वच्छंद औरतों को द्रोपदी कहकर!
व्यासजी ने दिया था आशीर्वाद
द्रौपदी एक एक वर्ष सभी
पाण्डवों के साथ रहेंगे
जब वह एक भाई से संबंध बना
जब दूसरे भाई के पास जाएगी
उसका कौमर्य पुन: वापस लौट आएगा
अन्य चार भाई नज़र उठा कर
तब पंचाली को नहीं देखेंगे पर
ये शर्त अर्जुन को रास न आई
वो पति रूप में सदा असहज बने रहे!
सभी अपने काम वासना को
नियंत्रित ना कर सके सबने
अलग-अलग स्त्रियों से संबंध बनाए
धर्मराज युधिष्ठिर ने देविका से
बलशाली भीम हिडिम्बा से
धनुर्धर अर्जन ने सुभद्रा,
उलपी और चित्रांगदा से
अश्विनी जुड़वा पुत्रों नकुल ने
जरासंध की पुत्री से और
सहदेव ने विजया से
दौपदी पांच पतियोंवाली होकर
ताउम्र प्रेम के लिए तरसती रही
सबकी शारीरिक इच्छाएं पूरी कर भी
स्वंय मांनसिक रूप सेअतृप्त रही!
ये द्रौपदी का कैसा शिव का वरदान था
एक पुरूष में सारी गुण ना हो सकते थे
तो पाँच पति रूप में पाण्डव दे डालें
इससे तो भली एक समान्य नारी है
जो एक पतिव्रधारी रहकर भी
जीवन सारे आनंद को पाती है!
कुमारी अर्चना
पूर्णियाँ,बिहार
मौलिक रचना
२/४/१८