मैं प्रकृति जैसी हूँ
प्रकृति क्षमता धारण करती है
मैं गर्भ को!
मैं पृथ्वी जैसी हूँ
पृथ्वी भार सहन करती है
मैं सहनशीलता को!
मैं जल जैसी हूँ
जल प्यासे की प्यास बुझाती है
मैं पुरूष की!
मैं सूर्य जैसी हूँ
सूर्य रोशनी की किरण बिखेरती है
मैं ममता की!
मैं चाँद जैसी हूँ चाँद चाँदनी फैलाता है
मैं करूणा व प्रेम को!
मैं नारी हूँ
मैं सृष्टिकर्ता का सृजन हूँ
सृजनशीलता ही मेरे जीवन का
एक मात्र ध्येय है!
कुमारी अर्चना'बिट्टू'
मौलिक रचना
Monday, 4 March 2019
"मैं नारी हूँ"
Sunday, 3 March 2019
"हाँ,बेटी हूँ
हाँ बेटी हूँ तो क्या हुआ
किसी बेटे से कम नहीं
मैं भी पढ़ लिखकर समाज में मान बढ़ाउँगी
बापू तेरा नाक ना कटाउँगी
किसी के साथ भागकर!
ममता का तेरे सम्मान करूँगी
माँ मैं तेरी पूजा करूँगी!
भगवान है तू धरती का
तेरे आँचल को कभी ना
शर्मसार करूँगी!
तेरे और दूसरों के घर आँगन को
सदा महकाउँगी मैं शपथ लेती हूँ आज
मैं भी एक बेटी ज़रूर पैदा करूँगी!
तेरे बेटी जनने की परम्परा को
कभी ना मरने दूँगी
चाहे मैं क्यों ना मर जाँउ!
कुमारी अर्चना'बिट्टू'
मौलिक रचना
"ट्यूलिप का फूल"
बसंत में जब उपवनों में
रंग बिरंगे खिल जाते
वैसे तुम मेरे दिल में
इसी मौसम में हम मिले थे!
ट्यूलिप का फूल जैसे
मेरा वो फूल हो चटकीला भड़किला सा
मानो तुम्हारे लिबाज़ हो
लाल,बैगनी,सुनहरा सा
सबके मन मोह जाता
जैसे तुम मेरा!
ट्यलूप के फूलों को पलट दूँ
तो तेरे माथे की पगड़ी बन जाए
यह मेरे प्रियतम का मान है
प्राणों से प्रिय है ये मुझे
पानी के साथ अपने
पसीने से सींचती हूँ
कहीं सुख ना जाए ये
आँसूओं से डूबोती हूँ
कहीं मर ना जाए
मन में आश जलाये रखती हूँ
धूप दीप दिखा तुझे
सलामती की दुआ मांगती हूँ!
इनके फूलों में तुम्हारी प्रतिछाया
जो पाती हूँ तन मन प्रफूलित रहता
मेरा जैसे तुम्हारे पास होने पर होता था!
कुमारी अर्चना'बिट्टू'
पुर्णियाँ,बिहार
मौलिक रचना
"वो खराब हो गई"
खूब सजती सँवरती
जैसे बलि के बकरे को
सजाया जाता आहूति के लिए
एक रात की दुल्हन बनती
रोज आते उसे दुल्हे लेने पर
कभी भी कोई डोली ले
अपने घर आँगन ना ले जाता!
माँ बन जनती उनके बच्चों की
पर पिता का नाम कभी कह पाती
ना ही समाज कभी मान्यता देता
जायज होकर भी नाजायज बने रहते!
क्योंकि उनकी माँग में सिदूंर नहीं
गले में मंगलसूत्र नहीं रस्मों व रिवाजों से
समाज ने संबंध बनाने की मुहर नहीं लगाई
बिना विवाह से संताने पैदा करती
वो खराब हो गई है!
कई पुरषों से सहवास कर पर
वो पुरूष खराब ना कर
उसके साथ मुँह काला कर
और अपनी रातें रंगीन बनाकर!
समाज के दोगले प्रतिमान है
एक औरत कई से संबंध बनाये तो रंडी,वैश्या,बेहय्या,गंदी जाने कितने नाम पर
कोई अपना नाम नहीं उसका!
पर पुरूष कई औरतों से
अंर्तरंग संबंध बनाकर भी
महान,अच्छा,संस्कारी भाई,पता,पिता
उसे कोई क्यों नहीं चरित्रहीन गंदा व रंडा कहता
फिर क्यों नहीं कोई अलग इलाका उनका बस्ता!
ये व्यवस्था ही पुरूष प्रधान है
जहाँ हर नियम पुरूष बनाता है
स्त्री मासिक धर्म हुआ तो अपवित्र ना हुआ तो
स्त्री है ही नहीं ना बच्चा पैदा करे तो बाझिन है
आजादी से बाहर जायें तो आवाँरा है
किसी से प्यार करें तो कुलनाशी है
पर पुरूष से संबंध बनाये तो
कुलटा है कालमुँही है!
अपने शरीर की भूख को
सिर्फ पुरूष शांत कर सकता है
औरत को परम्परा में रहकर करना होगा
वो भी जब पुरूष दें ना मांग सकती है
ना ही ले सकती है क्योंकि वो स्त्री है
उसे सब्र रखना होगा
मानवीय इच्छों को दवा होगा
मन को मारना होगा
संस्कारों का पिटारा ढ़ोना होगा
यही उसकाश स्त्री धर्म है
इस लक्ष्मण रेखा को लांध तो
वो खराब हो गई!
कुमारी अर्चना'बिट्टू'
मौलिक रचना
पूर्णियाँ,बिहार
मेरी गुलमेंहदी"चीरामीरा"
मेरी गुलमेहंदी "चीरामीरा"
देवी-दवाओं की है पहली पसंद
मेरे देवता की भी वो मनपसंद
इंद्रधनुषी की सातरंगी छटा लिए
वो तन मन को है लुभावती!
सफेद फूल भगवान शिव और सरस्वती माता को लक्ष्मी,दुर्गा,काली व गौरी को लाल
और गुलाबी कृष्णा को बढ़ भाती
फूल बैंगनी रंगों की!
हिन्दी में गुलमेहंदी अंग्रेजी में
बाग़ बालसम और चीरामीरा के नाम से
पूर्वी क्षेत्रों में जानी जाए!
बारिश के मौसम में बीज मिट्टी में पड़ते ही
ठंड की ठुठुरन में भी जो रंग बिरंगे खिल जाए
एकहरी सी काया लिए!
इन फूलों को जब नहीं लगाया जाता
वे कीटों द्वारा परागित हो उठते!
बाद फली द्वारा प्रतिस्थापित तो
कभी स्वत: कर्लिग द्वारा फट
ओस की तरह बिखर जाते!
मैं कैसे स्थापित करूँ
तेरे मूरत ओ मेरे कान्हा तू तो
न ही फूल है ना ही कोई पत्थर है तू
तो जीता जागत मानुष है इसलिए
तुझे दिल के मंदिर का देवता बनाकर
गुलमेहदी चढ़ाती हूँ सोचती तू
तुझे मेहदी की तरह घीस कर
अपने हाथों में रच लूँ
तेरे प्यार का रंग कभी न छूटे
तेरा साथ कभी न टूटे!
कुमारी अर्चना
पूर्णियाँ,बिहार मौलिक रचना
Friday, 1 March 2019
"मैं कवयित्री नहीं हूँ"
मैं कवयित्री नहीं हूँ
क्योंकि अभी शब्द मुझे खेल रहे
जिस दिन मैं शब्दों से खेलूँगी
मैं उस दिन कवयित्री बन जाऊंगी!
मैं कवयित्री नहीं हूँ क्योंकि
अभी मैंने कलम पकड़ना सीखा है
जिस दिन मैं क़लम चलाना सीख जाउँगी
मैं उस दिन कवयित्री बन जाऊंगी!
मैं कवयित्री नहीं हूँ क्योंकि
अभी भी कल्पनाओं में हूँ
जिस दिन कल्पनायें मुझमें होगी
मैं उस दिन कवयित्री बन जाऊंगी!
मैं कवयित्री नहीं हूँ
मैं अभी शब्दों की गुलाम हूँ
जिस दिन शब्द मेरे गुलाम होंगे
उस दिन कवयित्री बन जाऊंगी!
मैं कवयित्री नहीं हूँ
क्योंकि कविता मेरे दिल की भावनाएं है
जिस दिन ज़िन्दगी के अनुभव बन जाएगी
मैं कवयित्री बन जाऊंगी!
कुमारी अर्चना'बिट्टू'
मौलिक रचना
मनहरण धनाक्षरी
बसंत की हे बयार
संग बहु मझंधार
मन का पिहू भरे रे,
उड़ा गया रे चैन
धूप जोवन खिलाये,
पुष्प वन महकाये
पपीहा मंद मुस्काये
मन भावन रैन!
रश्मियाँ दुलार में,
यामिनी इजहार में
प्रेयसी इंतजार में,
हे मधुमास नैन
फागुन में रंग पड़े,
मन में उमंग भरे
राधा तरंग लिए,
श्याम रहे मौन!
कुमारी अर्चना'बिट्टू'