Saturday, 9 March 2019

"मैं उसकी माँ नहीं"

जाने क्यों मेरी भावनाओं का वेग
काले बादलों सा उमड़ रहा
और मेरी सोई हुई ममता को जगा रहा
बिजली सी कौध मची है कालेजे में
दिल का एक कौंध मची है कालेजे में
पल भर के लिए आँखे लगने पर
कोई छीन ले जाता मेरी नेहल को
और सुनी कर जाता मेरी गोद
अकास्मात नींद खुलती है
ढूढ़ती हूँ उसको बिस्तर पर
यकायक अभास होता है
मुझको मैं उसकी माँ नहीं!
अदृश्य परछाई नजर आती है
बच्चा माँ की गोद में है
मैं बच्चे की माँ नहीं!
कुमारी अर्चना'बिट्टू'
मौलिक रचना

"प्रभु के कई नाम"

माखन चुरा चुरा खाऐ
यशोदा के लाल रे!
राक्षसों का वध करे
अवतार विष्णु रे!
रंग दे चनरियाँ गुलाल से
मथुरा के लाल रे!
मेरी मट्की फोड़ दे
वृदावन के लाल रे!
लीला खेले रे
गोपी के कन्हैया रे!
रासलीला संग रचाएं रे
राधा के गोपाल रे!
राजनीति कर महाभारत करे
रूकमणी के स्वामी रे!
बाबरी प्रेम में करे
मीरा के धनश्याम रे!
कुमारी अर्चना'बिट्टू'
मौलिक रचना

"एक मात्र प्यार"

जाने कितने मौसम आये
और कितने सावन की फूहारे बन आये
बाद मुझे पतझड़ बनाकर चले गये!
जो रह गया चट्टान सा अटल
बरगद सा अपने शाखाये फैलाये
मुझे अपनी आगोश में माघ सा समेटे रहा
मेरे मन मंदिर को आज भी
अपना फागूनी रंग दे रहा!
अपनी भिन्नी भिन्नी खुशबू से
मुझे भादों बना रहा!
जिसका नाम ऋतुओं जैसा मुझे
मँहजुबानी याद रहेगा
ज़िन्दगी की अंतिम साँसों तक
वही 'एकमात्र प्यार' है
बाकी सब आकर्षण मात्र थे!
कुमारी अर्चना'बिट्टू' मौलिक रचना

"बरस जाओ बादलों तुम आज"

बरस जाओ बादलों
बिन काले मेघों के!
बरस जाओ बादलों
बिन सावन के!
भींग जाये मेरा तन मन
बिन प्यार के बूँदों के!
नाचूँ मैं मगन होके
बिन बालम के!
अब तो ना तरसाओ बादलों
आ जाओ मेरे बालम बनके!
मेरा हाथ थामने के लिए
वो तो ना आये
बरस जाओ बादलों तुम आज!
कुमारी अर्चना'बिट्टू'
मौलिक रचना

Wednesday, 6 March 2019

"ईश्वर की सुविचारित योजना"

चाँद का चाँदनी से मिलना
फूल का खुशबू से निकलना
नदियों,झरनों का सागर से मिलना
सूरज का रोशनी का फैलना
आसमान में बादल का होना
चड़ियों का चहचहाना!
इन्सान का इन्सान होना जानवर न होना
सबकी हथेलियों में अलग रेखाओं का होना
जीव और जंतुओं में विविधता का होना
ईश्वर का अदृश्य होकर भी सब में होना!

प्यार का दिमाग में नहीं दिल में होना
ये कोई संयोग नहीं?
ईश्वर की सुविचारित योजना है
क्योंकि प्यार केवल दो प्रेमी प्रेमिका का
मिलन नहीं दो भावनों का मिलन है!
कुमारी अर्चना"बिट्टू"
मौलिक रचना

"जाने जी कुछ उचट चुका है"

जाने जी कुछ उचट चुका है
मालूम नहीं क्यों ज़िन्दगी से
या मन से या खुद से!
मैं कुछ नाराज सी हूँ
जमाने से
अपनों से
बेगानों से
दोस्तों से
मालूम नहीं किस से ढूढ़ रही हूँ
कोई समाधान इन उठी द्वविधाओं का
जो मुझे सुलझा सके
खुद मुझ से और इन सवालों से!
कुमारी अर्चना"बिट्टू" मौलिक रचना

Tuesday, 5 March 2019

"दर्पण मैं तुम"

दर्पण को रोज देखती हूँ
तुम समझकर
तुम भी दर्पण को देखो
हम समझकर
दर्पण को चूम रही
तुम समझकर
तुम भी दर्पण को चूमों न
हम समझकर
इजहारे मोहब्बत पास
ना सही तो दूर से ही सही
मोहब्बत तो है
हमको आपसे
आपको हमसे!
कुमारी अर्चना"बिट्टू"