Monday, 31 March 2025

"मां मैं अब ना वापस आऊंगा"

"माँ मैं अब ना वापस आऊँगा"

मां मैं अब ना वापस आऊंगा
फिर से अपने घर को लौटकर 
ऑक्सीजन सिलेंडर पहले से तुम
मोहे अगले जन्म मंगवा कर ही रखना 
जाने कौन सी जानलेवा बिमारी हो जाएं 
मेरा साथ कोई दुर्धटना घटित हो जाएं 
जाने कब मुझे इसकी जरूरत पड़ जाएं।

ये भारत देश है यहाँ आदमी को
जनसुविधाओं का अभाव में 
जीना पड़ता है या मरना पड़ता है
सड़ चुका है यहाँ का सरकार तंत्र 
अस्पतालों से जीवनरक्षक दवाएं 
और डाॅक्टर हो गए बहुत ही कम
बेबस लाचार हो चुका है जनतंत्र 
जय हो जय हो भारत गणतंत्र!

कुमारी अर्चना
सहायक प्राध्यापिका 
एम जे. एम. महिला कालेज, कटिहार 
कटिहार,बिहार
मौलिक रचना 
31/03/25

Sunday, 30 March 2025

चरित्रहीन आदमी

चरित्रहीन आदमी"

उस आदमी के हत्या करने का
बार बार मन में विचार आता है
जिससे रिश्ता पालकर्ता का है
पर मरे को मारना कहाँ उचित है
जिसका आत्मा मर चुकी हो!

जिसने कभी गोद में खिलाया
हाथ पकड़ कर चलना सिखाया
साइकिल पर दौड़ना सिखाया
बेटी को भी बेटे के बराबर माना
बाहर पढ़ाई के लिए भेजा
पांव पर खड़ा होने लायक बनाया!

आखिर क्यों?उस आदमी के
हत्या का विचार मेरे मन में आया
सोचती हूँ वो परिवार कितना 
विवश हो जाता होगा जो
इस अपराध को अंजाम देता होगा
अवैध संबंध जाने कितने ही
घरों को बर्बाद कर रख देता हैं!

जवान बेटियाँ बिन हाथ
पीले हुए ही बुढ़ी हो जाती
कुछ मजबूर होकर भाग जाती
बेटे सम्पत्ति के लालसा में
पिता का ही साथ देते है व
समाजिक प्रतिष्ठा बचाते हैं
पत्नी को अपेक्षित छोड़
लोग उप पत्नियों रख लेते
जो रिश्ते में कुछ लगती है!

पर कहाँ लोक लाज का भय
स्त्रियों के मन में होता है जब
वो तृया चरित्र पर उतर आती
पुरूष तो ढ़ीठ होते ही है
काम सुख के आगे उनकी
बेटी भी नहीं दिखती है
ब्राह्मा जी इसी अपराध वश
अन्य देवताओं की भांति पृथ्वी
पर कहीं पूजे नहीं जाते हैं!

मैं उनकी हत्या कभी नहीं करूंगी
ये कानून की नजर में अपराध है
धर्म के अनुसार पाप होता है
सुना है ईश्वर सबको उसके
किएं हुए कर्मो का फल देते है
उस पापी को भी दंड अवश्य मिलेगा
क्योंकि किया हुआ पाप छुपता नहीं!

कुमारी अर्चना"बिट्टू"
मौलिक रचना
पूर्णिया,बिहार

Saturday, 29 March 2025

मेहंदी हूं मैं

"मेंहदी हूँ मैं "

मैं स्त्री मेंहदी जैसी ही हूँ
मेंहदी भी खुद पिसकर
दुसरों के हाथों में रंग भरती है
मैं स्त्री भी जिन्दगी भर
खुद पिसकर पुरूषों के
जीवन मेंखुशियाँ लाती हूँ !

कभी पिता के मान के लिए
कभी प्रेमी के प्यार के लिए
कभी पति के सम्मान के लिए
कभी पुत्र के दुलार के लिए
कभी परम्पराओं के नाम पर
कभी वंश के नाम पर
कभी संस्कारों के नाम पर
कभी परिवार के नाम पर
मुझे मेंहदी बनना पड़ता है 
तो कभी बना दी जाती हूँ !

स्त्री हूँ मैं इसलिए
मुझे पिसना होगा
मुझे घिसना होगी
मुझे टूटना होगा
मुझे मिटना होगा
मुझे दया रखनी होगी
मुझे लज्जा करनी होगी
यही मेरा गहना है !

मेरा स्वाभिमान
मेरी वजूद
मेरा शरीर
मेरा गर्भ
मेरा अघिकार
मेरी स्वतंत्रता
सब मेरे कक्तव्यों व दायित्वों के अधीन है
क्योंकि मैं स्त्री मेंहदी जैसी हूँ !

कुमारी अर्चना
पूर्णियाँ,बिहार
मौलिक रचना
६/५/१८

Friday, 28 March 2025

"धन्य गई मेरी कलम"

धन्य हो गई मेरी कलम
जो तुमको शब्दों में लिखती है
और लिखती रहेगी जब तक
तुम चाहोंगे......
क्योंकि तुम मेरे मन की
वो शक्ति हो जिसे
मेरी कलम मेहसूस करती है.....
इसलिए तो चलती रहती है
बिना रूके बिना थके बिना
मेरे कहें मेरी काव्यों के पन्नों पे!
कुमारी अर्चना
पूर्णियाँ,बिहार
मौलिक रचना
23/12/18

Sunday, 31 January 2021

"किनारा"


नदी को पार करती किस्ती हो
समुद्र में गोता लगाता जहाज
ज़िन्दगी की धारा हो
सब किनारा पर जाना चाहते हैं।

किनारा भी चाहता है
मुसाफिर उसके पास
सही सलामत आएं
फिर नयी राह जाएं।

मैं भी ज़िंदगी का 
किनारा चाहती हूं
एक छोर तुम हो
दूजे छोर पर मैं हूं
बीच में मझधार है
जाऊं तो आखिर कहां?

मैं भी तो किनारा हूं
शायद इसीलिए
तुम मुझे छोड़ गए
बहुत ही दर्द दे गए।

दोनों किनारे कभी मिल
ही नहीं सकते
एक दूजे के बिन हम
जी नहीं सकते।

फिर क्या सदा किनारे
पर ही खड़े रहेंगे?
कि मझधार के शांत होने 
का इंतजार करेंगे
आखिर कब तक
यूं ही किनारे रह के
अपनी-अपनी जिंदगियां काटेंगे।

कोई तो रास्ता होगा
दोनों के मिलने का
क्यों न किनारे को मिटा दें 
दोनों एक दूसरे में समांकर।

कुमारी अर्चना
मौलिक रचना

Saturday, 7 November 2020

"एक तरफा प्यार"


प्यार दो तरफा हो
या इक तरफा है
प्यार प्यार होता है
इक तरफा प्यार 
परवान नहीं चढ़ता
बीच में ही दम तोड़ देता।

किसी को चाहना
गलत नहीं,पर
किसी को पाने के लिए
किसी भी हदतक
गुजरना गलत है।

केवल मासंल पाने की
चाहत में दिखावे के लिए
किया लफ़ंगेबाजी कभी
प्यार नहीं हो सकता।

लड़की के प्रेम प्रस्ताव 
की अस्वीकृति पर उसका
पौरूष को ठेस लगती
लड़की होकर उसकी 
इतनी हिम्मत की मुझे
न कहो।
बदसूरत कर दो उसके
चेहरे को,जिस पर उसको
इतना घमंड है,एसिड
फोंको साली पर
रास्ता चलते गोली मारो
नग्न फोटो,वीडियो
वायरल की धमकी दो
ब्लैकमेल करो उसे 
गैग रैप करो
मेरी नहीं हुई तो मैं उसे 
किसी की भी नहीं होने दूँगा,
ससुराल जाके उसके
पुराने सब राज़ खोल दूँगा
फिर दौड़ी
सोने चली आएगी।

स्त्री भी पुरूष को
पाने की चाहत में
किसी भी हद तक 
चली जाती है
घड़ियाल आसूँओं को बहा
हुस्न के जाल में फंसा
षड्यंत्रों का खेलकर
तो कभी प्रेमिका व 
पत्नी की हत्या कर
पुरूष को हरहाल में
पाना चाहती है।

प्यार हमेशा देने का नाम है
किसी से जबरन छिनना 
प्यार नहीं हो सकता है
लोग अगर इसे प्यार कहते
है तो प्यार के मरम को 
नहीं समझते है
प्यार तो किस्मत वालें
को ही मिलता है।

कुमारी अर्चना"बिट्टू "
मौलिक रचना
कटिहार, बिहार

Friday, 6 November 2020

"उसको मुझसे कभी प्यार न था"


उसको मुझसे कभी प्यार न था
इसलिए मुझपर एतबार न था
वो शीशे समझ दिल तोड़ गया
मैंने कांच समझकर रख लिया
बार बार जख्मों को कुरती रही
प्यार की पौध हरी रख सकूँ!

स्वतः संवाद करती हूँ
अन्दर ही अन्दर उसकी कमी
रोज भरती रहती हूँ
कहते हैं मोहब्बत करनेवाले के 
दिल से दिल मिलते है
पर मुझे तो लगता है फेफड़े भी
मिलन के लिए मचलते है
रोम रोम प्यार की शरद छाँव में
डूबता जाता है
रक्त की धमनियाँ और शिराएँ
गर्म आँहें भरने लगती है
उससे मिलने के लिए
जिस्म के साथ रूहें भी
तड़पने लगती है!

फिर भी किसी से इक तरफा प्रेम
किसी पत्थर को मोम नहीं बनाता
वो इन्सान खुद पागल हो जाता है
पर दूसरे को दिवाना न कर पाता है!

कुमारी अर्चना"बिट्टू"
कटिहार,बिहार
मैलिक रचना