निर्भया ने अपने नाम को सार्थक किया
बिना भय के पाँच दरिदों से अकेली आधी रात में लड़ती रही! उसकी शरीर व आत्मा दोनों लहू से लथपथ हुई फिर हिम्मत ना हारे वो मर्दानी! न्याय की चौखट पर उसकी लाश ने बार बार फरिय़ाद लगाई फिर भी रह गया निर्भया का न्याय शेष! एक बालिग अपराधी बालिग होकर भी नाबालिग का सर्टीफिर्क्ट लगा कर बच निकला निर्भय की हड्डियों को तोड़ता-फोड़ता रहा अतड़ियों को चीरता-फाड़ता रहा रॉड से जब तक निर्भय मौत के कग़ार तक जा पहुँची ! उसका हत्यारा शराफ़त का चोला पहनकर फिर से समाज की बिल में छुप निकला! उसकी लूटी इज्जत काफी नहीं थी ना उसका दिया मौत से पहले का बयान कुल पाँच अपराधी थे वो ! कानूऩ के आखों पर पट्टी बंधी है बिन सबूत के किसी को न्याय नहीं मिलता जूबनाईल की उम्र ज्यादा थी अपराधी की कम रह गई निर्भया का न्याय शेष! कुमारी अर्चना पूर्णियाँ,बिहार मौलिक रचना, १५/५/१८
Tuesday, 15 May 2018
"रह गया निर्भया का न्याय शेष"
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